जो बीत गए दिन,
वो जमाने नही आते।
लकड़ी के आसियानों में,
चिरागों को मत रखना।
आग लगती है तो,
पड़ोसी बुझाने नही आते।
जो बीत गए..........
जब विटप लताओं से उमड़ा,
आते थे रैन बिताने पक्षी।
बर्षो बीते तरु को सूखे,
अब कोई पक्षी यहाँ
रैन बिताने नही आते
जो बीत गए............
अरसे गुजर गए
रेत में नमी को ढूढ़ते
पतझङ के मौसम में
वो बहार ढूढ़ते
बहार तो मिले ,
लेकिन वो मौसम नही आते
जो बीत गए वो जमाने नही आते।।
संगीता राजपूत
वो जमाने नही आते।
लकड़ी के आसियानों में,
चिरागों को मत रखना।
आग लगती है तो,
पड़ोसी बुझाने नही आते।
जो बीत गए..........
जब विटप लताओं से उमड़ा,
आते थे रैन बिताने पक्षी।
बर्षो बीते तरु को सूखे,
अब कोई पक्षी यहाँ
रैन बिताने नही आते
जो बीत गए............
अरसे गुजर गए
रेत में नमी को ढूढ़ते
पतझङ के मौसम में
वो बहार ढूढ़ते
बहार तो मिले ,
लेकिन वो मौसम नही आते
जो बीत गए वो जमाने नही आते।।
संगीता राजपूत
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