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पद्मावती के लिए जो खून ख़ौला नसों में           काश ख़ौल जाता            हर एक नारी के लिए तो हमारे साहित्य में स्त्री विमर्श शब्द ना होता               राजपूतों की नाक कटी               काश कट जाती इंसानियत की क्योकि अलाउद्दीन भी एक  पुरुष ही था               फिर एक पुरुष ही अब                बात करतें है स्त्री की आबरूं की वो सच नही लगता है सिवाय फददे मजाक के             कैसे बन सकता है एक पुरुष             न्यायधीश और अपराधी।।
सदियों पुराने  इतिहास को मनोरंजन बनते देख कर खून ख़ौल गया राजपूतों का, वो नारी थी जो इतिहास बना गयी क्या आज की नारी ,नारी नही है जो रोज बनाते है मजाक वर्तमान का अतीत  था वो बीत गया अब खुद ही सम्भालों इस पल को ऐसा ना हो कहीं आगे की पीढ़ी मनोरंजन के लिए खुद ही इतिहास उठाये सच में ख्याल है यदि नारी का तो इंसानियत को जगा लो और बचा लो नारी का आज ,और कल,  काला बनने से।।
यादें बचपन की वो जाड़े के दिन और हम सब लोग बैठते थे आग के पास जब घेर के उसे होते थे राजा रानी के किस्से लगते थे कितने सच्चे           क्यों चले गए वो दिन           क्यों चले गए वो दिन वो काली सी तख्ती लगती थी कितनी अच्छी लिखो मिटाओ कितनी बार वो सिरकेंटा की कलम टूटती थी कई बार वो खड़िया की भरी शीशी लुढ़कती थी बार बार               क्यों चले गए वो दिन               क्यों चले गए वो दिन वो लू के गर्म थपेड़े और चेप से भरे वो आम वो नाना की फटकार और नानी का दुलार              क्यों चले गए वो दिन               क्यों चले गए वो दिन वो रेत का भरा दडा(कच्चा रास्ता) और पतेल से भरा सुबह की ठण्डी रेत को पैर से उछाल के चलना ना गन्दे होने का डर ना पैर फटने का डर               क्यों चले गए वो दिन       ...
जो बीत गए दिन,               वो जमाने नही आते। लकड़ी के आसियानों में,                   चिरागों को मत रखना। आग लगती है तो,                 पड़ोसी बुझाने नही आते।                                   जो बीत गए..........  जब विटप लताओं से उमड़ा,                    आते थे रैन बिताने पक्षी।  बर्षो बीते तरु को सूखे,                    अब कोई  पक्षी  यहाँ रैन बिताने  नही आते                    जो बीत गए............ अरसे गुजर गए                    रेत में नमी को ढूढ़ते पतझङ के मौसम में                    वो बहार...
शत शत ओ पुरुष शत शत रे नमन। मत मान ले नर नारी को खिलौना खेल लिया और  तोड़ दिया यह नारी है अबला ना समझ जो पड़ती है नर पर भारी व्याकरण उठा के  देख पुरुष आएगी समझ तब नर की नारी वो तेरे जुर्मो को सहती है तो खुद में  तू बलबान नही वो अबला से बलबान बनी उसमे भी रहा तेरा योगदान तेरे इन अत्याचारों से सीता से बना दी चण्डी काली है धन्य बड़ा तू अज्ञानी शत शत ओ पुरुष शत शत रे नमन।। संगीता राजपूत

कविता

जीवन की नैया निकली है तो पार जाना होगा अगर कुछ राग छेड़ा है तो फिर गाना होगा मत हो उदास इन मातो से तुझे कामयाब होना होगा जिंदगी कब कहती है कि मैं सहज हूँ फिर भी इसे सुगम बनाना होगा चीर दो गिरि के उरों को फिर उसे गिरना होगा लेना है  मोती जलधि से तो तरंगिणी बनना होगा गम हो जितना जीवन में उतना इतराना सीख लो आगे मुसाफिर बहुत है जिन्हें मुस्कराना सिखाना होगा  संगीता राजपूत फ़िरोज़ाबाद