यादें बचपन की



वो जाड़े के दिन
और हम सब लोग
बैठते थे आग के पास
जब घेर के उसे
होते थे राजा रानी के किस्से
लगते थे कितने सच्चे
          क्यों चले गए वो दिन
          क्यों चले गए वो दिन
वो काली सी तख्ती
लगती थी कितनी अच्छी
लिखो मिटाओ कितनी बार
वो सिरकेंटा की कलम
टूटती थी कई बार
वो खड़िया की भरी शीशी
लुढ़कती थी बार बार
              क्यों चले गए वो दिन
              क्यों चले गए वो दिन
वो लू के गर्म थपेड़े
और चेप से भरे वो आम
वो नाना की फटकार
और नानी का दुलार
             क्यों चले गए वो दिन 
             क्यों चले गए वो दिन
वो रेत का भरा दडा(कच्चा रास्ता)
और पतेल से भरा
सुबह की ठण्डी रेत को
पैर से उछाल के चलना
ना गन्दे होने का डर
ना पैर फटने का डर
              क्यों चले गए वो दिन
              क्यों चले गए वो दिन
वो झमाझम बारिश
और वो टपाटप छप्पर
टाट बोरी की छतरी
लगा कर स्कूल जाना
              क्यों चले गए वो दिन
              क्यों चले गए वो दिन
वो पानी से भरा स्कूल
और कागज की नाव
उस पर चींटे की सवारी
लगती थी कितनी प्यारी
               क्यों चले गए वो दिन
               क्यों चले गए वो दिन

संगीता राजपूत
फ़िरोज़ाबाद



  

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