पद्मावती के लिए
जो खून ख़ौला नसों में
काश ख़ौल जाता
हर एक नारी के लिए
तो हमारे साहित्य में
स्त्री विमर्श शब्द ना होता
राजपूतों की नाक कटी
काश कट जाती इंसानियत की
क्योकि अलाउद्दीन भी
एक पुरुष ही था
फिर एक पुरुष ही अब
बात करतें है स्त्री की आबरूं की
वो सच नही लगता है
सिवाय फददे मजाक के
कैसे बन सकता है एक पुरुष
न्यायधीश और अपराधी।।
जो खून ख़ौला नसों में
काश ख़ौल जाता
हर एक नारी के लिए
तो हमारे साहित्य में
स्त्री विमर्श शब्द ना होता
राजपूतों की नाक कटी
काश कट जाती इंसानियत की
क्योकि अलाउद्दीन भी
एक पुरुष ही था
फिर एक पुरुष ही अब
बात करतें है स्त्री की आबरूं की
वो सच नही लगता है
सिवाय फददे मजाक के
कैसे बन सकता है एक पुरुष
न्यायधीश और अपराधी।।
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