कविता
जीवन की नैया निकली है
तो पार जाना होगा
अगर कुछ राग छेड़ा है
तो फिर गाना होगा
मत हो उदास इन मातो से
तुझे कामयाब होना होगा
जिंदगी कब कहती है कि मैं सहज हूँ
फिर भी इसे सुगम बनाना होगा
चीर दो गिरि के उरों को
फिर उसे गिरना होगा
लेना है मोती जलधि से
तो तरंगिणी बनना होगा
गम हो जितना जीवन में
उतना इतराना सीख लो
आगे मुसाफिर बहुत है
जिन्हें मुस्कराना सिखाना होगा
संगीता राजपूत
फ़िरोज़ाबाद
तो पार जाना होगा
अगर कुछ राग छेड़ा है
तो फिर गाना होगा
मत हो उदास इन मातो से
तुझे कामयाब होना होगा
जिंदगी कब कहती है कि मैं सहज हूँ
फिर भी इसे सुगम बनाना होगा
चीर दो गिरि के उरों को
फिर उसे गिरना होगा
लेना है मोती जलधि से
तो तरंगिणी बनना होगा
गम हो जितना जीवन में
उतना इतराना सीख लो
आगे मुसाफिर बहुत है
जिन्हें मुस्कराना सिखाना होगा
संगीता राजपूत
फ़िरोज़ाबाद
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